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डॉ. सचिन पाल

थनैला रोग

गाय-भैंस में थन की सूजन और संक्रमण

🩺लक्षण पहचानें

• थन में सूजन और गर्माहट

• दूध में खून या मवाद

• दूध में दाने या झिल्ली

• दूध उत्पादन में कमी

• थन छूने पर दर्द

• बुखार (गंभीर मामलों में)

🔍मुख्य कारण

  • • गंदे और गीले फर्श पर रहना
  • • दूध निकालते समय साफ-सफाई की कमी
  • • जीवाणु संक्रमण
  • • थन में चोट या घाव
  • • अधूरा दूध निकालना

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकअवधि
मास्टिलेपथन में डालने वालीप्रभावित थन में १ सिरिंज३-५ दिन
टोपेंडथन में डालने वालीप्रभावित थन में १ सिरिंज३ दिन
जेंटामाइसिनइंजेक्शन५-१० मिली५ दिन
सेफ्टीओफरइंजेक्शन१ मिली प्रति ५० किलो३-५ दिन
मेलोनेक्सइंजेक्शन (दर्द निवारक)१०-१५ मिली३ दिन

🛡️बचाव कैसे करें

✓ दूध निकालने से पहले थन धोएं

✓ साफ और सूखा बिछावन रखें

✓ पूरा दूध निकालें

✓ दूध निकालने के बाद थन साफ करें

✓ नियमित थन की जांच करें

✓ सूखे पशु को थन में दवा दें

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • तेज बुखार (१०४°F से ऊपर)
  • • थन में गलन या काला रंग
  • • पशु खाना-पीना बंद कर दे
  • • दूध में बदबू आए
  • • २ दिन में सुधार न हो

विशेषज्ञ सलाह के लिए अभी संपर्क करें

मुंहपका-खुरपका रोग

अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी - तुरंत इलाज जरूरी

🩺लक्षण पहचानें

• तेज बुखार (१०४-१०६°F)

• मुंह में छाले और लार गिरना

• खुरों में घाव और लंगड़ापन

• थन पर छाले

• खाना-पीना बंद करना

• दूध उत्पादन में भारी गिरावट

• मुंह चपचपाना और आवाज करना

• कमजोरी और सुस्ती

🔍मुख्य कारण

  • • वायरल संक्रमण (अत्यधिक संक्रामक)
  • • संक्रमित पशु के संपर्क में आना
  • • संक्रमित चारा या पानी
  • • हवा के माध्यम से फैलाव
  • • टीकाकरण न होना
  • • गंदगी और भीड़-भाड़ वाले स्थान

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकअवधि
मेलोनेक्सइंजेक्शन (बुखार)१५-२० मिली३-५ दिन
पैरासिटामोल बोलसगोली (बुखार)२-३ गोली३ दिन
ऑक्सीटेट्रासाइक्लिनइंजेक्शन (संक्रमण)१० मिली५ दिन
विटामिन बी-कॉम्प्लेक्सइंजेक्शन (ताकत)१० मिली५-७ दिन
ग्लिसरीन बोरेक्समुंह में लगाने कीदिन में २-३ बारजब तक ठीक हो
पोटाशियम परमैंगनेटखुर धोने कीपतला घोलरोज
कॉपर सल्फेटखुर में लगाने कीपाउडर या पेस्टरोज

🛡️बचाव कैसे करें

✓ नियमित टीकाकरण (साल में २ बार)

✓ संक्रमित पशु को अलग रखें

✓ साफ-सफाई का विशेष ध्यान

✓ नए पशु को अलग रखकर जांचें

✓ चारा-पानी साफ रखें

✓ बाहरी लोगों का आना-जाना कम करें

विशेष सावधानियां

  • • यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है
  • • संक्रमित पशु को तुरंत अलग करें
  • • उपयोग के बर्तन अलग रखें
  • • पशु चिकित्सा विभाग को सूचित करें
  • • मरे पशु को गहरा दबाएं या जलाएं
  • • टीकाकरण सबसे बेहतर बचाव है

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • तेज बुखार (१०४°F से ऊपर)
  • • पशु बिल्कुल खाना-पीना बंद कर दे
  • • सांस लेने में दिक्कत हो
  • • दिल की धड़कन बहुत तेज हो
  • • पशु लड़खड़ाने लगे

विशेषज्ञ सलाह के लिए अभी संपर्क करें

अफरा रोग (पेट फूलना)

पेट में गैस भरना - जानलेवा हो सकता है, तुरंत इलाज करें

🩺लक्षण पहचानें

• पेट का बायां हिस्सा फूलना

• बेचैनी और घबराहट

• बार-बार लेटना और उठना

• खाना-पीना बंद करना

• जुगाली न करना

• सांस लेने में तकलीफ

• पेट पर थपथपाने से ड्रम जैसी आवाज

• लार गिरना और मुंह से झाग

🔍मुख्य कारण

  • • अधिक हरा चारा खा लेना (खासकर बरसीम, लूसर्न)
  • • गीला या ओस वाला चारा खाना
  • • अधिक दाना या सड़ा हुआ चारा
  • • गेहूं का भूसा ज्यादा खा लेना
  • • पेट में किसी चीज का अटक जाना
  • • अचानक चारा बदलना

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकउपयोग
टिम्पोलतरल दवा१००-२०० मिलीगैस निकालने के लिए
ब्लोटोसिलतरल दवा१००-१५० मिलीगैस और अफरा दूर करने को
तारपीन का तेलतेल१००-२०० मिलीगैस निकालने और पाचन
सरसों का तेलतेल२५०-५०० मिलीपाचन तंत्र सुधारने को
पाचक चूर्णचूर्ण५०-१०० ग्रामपाचन सुधारने के लिए
मैग्नीशियम सल्फेटनमक२५०-५०० ग्रामपेट साफ करने के लिए

🏠घरेलू उपचार (हल्के अफरे में)

  • • सरसों का तेल २५० मिली मुंह में डालें
  • • हींग १०-२० ग्राम पानी में घोलकर पिलाएं
  • • अजवाइन ५० ग्राम पानी में उबालकर पिलाएं
  • • नीम की पत्ती पीसकर १०० ग्राम खिलाएं
  • • पशु को चलाते रहें (गैस निकलने में मदद)
  • • ठंडा पानी पेट पर डालें

🛡️बचाव कैसे करें

✓ हरा चारा धीरे-धीरे बढ़ाएं

✓ गीला या ओस वाला चारा न दें

✓ अचानक चारा न बदलें

✓ खाने से पहले सूखा चारा दें

✓ पानी हमेशा साफ रखें

✓ नियमित व्यायाम करवाएं

🚨तुरंत डॉक्टर को बुलाएं अगर

  • • पेट बहुत ज्यादा फूल गया हो
  • • सांस लेने में बहुत तकलीफ हो
  • • पशु गिरने लगे या बेहोश हो
  • • घरेलू इलाज से १-२ घंटे में आराम न हो
  • • मुंह नीला पड़ने लगे
  • • बहुत तेज बेचैनी हो

⚡ नोट: गंभीर अफरे में ट्रोकार से गैस निकालनी पड़ती है - यह सिर्फ डॉक्टर ही कर सकते हैं!

प्रजनन समस्याएं

गर्मी न आना, रुका हुआ जेर, बांझपन का इलाज

🩺मुख्य समस्याएं

• गर्मी न आना (मद न आना)

• बार-बार गर्मी आना (गर्भ न ठहरना)

• रुका हुआ जेर (नाल न गिरना)

• गर्भपात हो जाना

• बच्चेदानी बाहर आना

• सफेद पानी आना (ल्यूकोरिया)

🔍मुख्य कारण

  • • कमजोरी और कुपोषण
  • • विटामिन और खनिज की कमी
  • • गर्भाशय में संक्रमण
  • • हार्मोन असंतुलन
  • • गलत समय पर गर्भाधान
  • • अंडाशय में सिस्ट (गांठ)
  • • ब्यांत के समय चोट लगना

💊इलाज और दवाएं

समस्यादवा का नामखुराकउपयोग
रुका हुआ जेरऑक्सीटोसिन इंजेक्शन२०-३० यूनिटजेर निकालने के लिए
गर्मी न आनाजीपीजी इंजेक्शनडॉक्टर के अनुसारहार्मोन संतुलन
गर्मी न आनापीजीएफ२अल्फा२ इंजेक्शन (११ दिन के अंतर पर)गर्मी लाने के लिए
संक्रमणसेफ्टीओफर इंजेक्शन१ मिली प्रति ५० किलोगर्भाशय संक्रमण
सफेद पानीमेट्रोनिडाजोल बोलसगर्भाशय में डालने कीसंक्रमण साफ करने को
कमजोरीकैल्शियम बोरोग्लूकोनेट४५० मिली (नस में)ताकत के लिए
पोषणमिनरल मिक्सचर५०-१०० ग्राम रोजविटामिन-खनिज पूर्ति

🔬कृत्रिम गर्भाधान (एआई) की सही जानकारी

  • सही समय: गर्मी शुरू होने के १२-१८ घंटे बाद
  • पहचान: पशु बेचैन हो, बार-बार पेशाब करे, दूसरे पशुओं पर चढ़े
  • दोहराना: अगर पहली बार गर्भ न ठहरे तो १२ घंटे बाद दोबारा
  • गुणवत्ता: अच्छी नस्ल का बीज चुनें
  • सफाई: गर्भाधान से पहले साफ-सफाई जरूरी

🛡️बचाव कैसे करें

✓ पौष्टिक आहार दें

✓ नियमित व्यायाम करवाएं

✓ मिनरल मिक्सचर नियमित दें

✓ साफ-सफाई का ध्यान रखें

✓ गर्मी का सही समय पहचानें

✓ प्रशिक्षित एआई तकनीशियन बुलाएं

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • ब्यांत के २४ घंटे बाद भी जेर न गिरे
  • • गर्भाशय बाहर निकल आए
  • • बदबूदार स्राव आए
  • • तेज बुखार हो
  • • लगातार ३-४ बार गर्भ न ठहरे
  • • ६ महीने से ज्यादा गर्मी न आए

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लंगड़ापन और खुर रोग

खुरों में संक्रमण, घाव और लंगड़ापन का इलाज

🩺लक्षण पहचानें

• लंगड़ाकर चलना

• खुर में सूजन और गर्माहट

• खुरों से बदबू आना

• खुर में मवाद या खून

• पशु खड़े होने से मना करे

• बुखार (संक्रमण होने पर)

• खाना-पीना कम करना

• दूध उत्पादन में कमी

🔍मुख्य कारण

  • • गंदे और गीले फर्श पर रहना
  • • कीचड़ और गोबर में रहना
  • • खुरों की सफाई न करना
  • • कठोर या पथरीली जमीन पर चलना
  • • खुरों में पत्थर या कांटा चुभना
  • • जीवाणु संक्रमण (फुट रॉट)
  • • खुरों का अधिक बढ़ जाना

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारउपयोगअवधि
पोटाशियम परमैंगनेटघोल (धोने की)खुर धोने के लिएरोज २-३ बार
कॉपर सल्फेटपाउडर/पेस्टघाव में लगाने के लिएरोज १ बार
बोरिक एसिड पाउडरपाउडरखुर में छिड़कने के लिएरोज
आयोडीन टिंचरतरलघाव साफ करने के लिएरोज
ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन स्प्रेस्प्रेसंक्रमण रोकने के लिएरोज २ बार
पेनिसिलिन इंजेक्शनइंजेक्शनगंभीर संक्रमण में५ दिन
मेलोनेक्सइंजेक्शन (दर्द)दर्द और सूजन कम करने को३ दिन

🔧इलाज कैसे करें (कदम-दर-कदम)

  1. सफाई: पहले खुर को गुनगुने पानी से धोएं
  2. काटना: अगर खुर बढ़ गया हो तो काटें
  3. घाव साफ करें: पोटाशियम परमैंगनेट के घोल से धोएं
  4. दवा लगाएं: कॉपर सल्फेट या आयोडीन लगाएं
  5. पट्टी बांधें: साफ कपड़े से पट्टी करें
  6. सूखा रखें: पशु को सूखी जगह पर रखें
  7. रोज दोहराएं: जब तक ठीक न हो

🛡️बचाव कैसे करें

✓ फर्श सूखा और साफ रखें

✓ नियमित खुर की सफाई करें

✓ ६ महीने में खुर कटाई करें

✓ फुट बाथ (खुर नहाने का गड्ढा) बनाएं

✓ नियमित व्यायाम करवाएं

✓ पौष्टिक आहार दें (जिंक, बायोटिन)

🛁फुट बाथ कैसे बनाएं

  • • २-३ फीट लंबा और १ फीट चौड़ा गड्ढा बनाएं
  • • ६-८ इंच गहरा रखें
  • • कॉपर सल्फेट या फॉर्मेलिन का घोल भरें
  • • सप्ताह में २-३ बार पशुओं को इससे गुजारें
  • • हर १५ दिन में घोल बदलें

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • खुर से खून बहुत ज्यादा बह रहा हो
  • • बदबू बहुत तेज हो
  • • पशु बिल्कुल खड़ा न हो पाए
  • • तेज बुखार हो
  • • ३-४ दिन में आराम न हो
  • • खुर का हिस्सा टूट गया हो

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पी.पी.आर (छोटे मवेशियों की प्लेग)

बीमारी के बारे में:

पी.पी.आर एक तीव्र वायरल रोग है जो मुख्य रूप से भेड़ और बकरियों को प्रभावित करता है । इस बीमारी में मृत्यु दर 80-100% तक हो सकती है । यह मॉर्बिलीवायरस परिवार का वायरस है जो खसरा और कुत्तों के डिस्टेंपर वायरस से संबंधित है।

लक्षण:

  • अचानक तेज बुखार (104-106°फारेनहाइट)
  • नाक और आँखों से गाढ़ा पानी बहना
  • मुँह, होंठ और जीभ में छाले और घाव
  • गंभीर दस्त (हरे-भूरे रंग का, कभी खूनी)
  • साँस लेने में तकलीफ और खाँसी
  • नाक से बदबूदार बलगम निकलना
  • भूख पूरी तरह बंद हो जाना
  • तेजी से कमजोर होना और वजन घटना
  • गर्भपात हो सकता है

रोग का फैलाव:

बीमार जानवरों के स्राव और मल-मूत्र से यह रोग फैलता है । भीड़भाड़ वाली जगहों पर तेजी से फैलता है। संक्रमित जानवरों के साँस के जरिए वायरस स्वस्थ जानवरों में प्रवेश करता है ।

निदान:

लक्षणों के आधार पर प्रारंभिक निदान किया जाता है । पुष्टि के लिए पीसीआर टेस्ट और एलिसा टेस्ट किया जाता है। खून, लिम्फ नोड्स और टॉन्सिल की जाँच की जाती है।

उपचार और बचाव

महत्वपूर्ण: पी.पी.आर का कोई सीधा इलाज नहीं है । केवल सहायक उपचार दिया जाता है।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटीबायोटिक (द्वितीयक संक्रमण रोकने के लिए):

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (टेरामाइसिन/एलए-200) - 20 मिग्रा प्रति किलो शरीर भार , मांसपेशी में इंजेक्शन, दिन में एक बार 5-7 दिन तक
  • टाइलोसिन - भेड़-बकरी में उपयोगी पाया गया , 10 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार
  • पेनिसिलिन + स्ट्रेप्टोमाइसिन - संयुक्त इंजेक्शन, निमोनिया रोकने के लिए

२. द्रव चिकित्सा (डीहाइड्रेशन के लिए):

  • शरीर के द्रव संतुलन को बहाल करने के लिए तरल पदार्थ चिकित्सा आवश्यक है
  • ग्लूकोज सैलाइन - नस में या त्वचा के नीचे, 500 मिली-1 लीटर प्रतिदिन
  • ओआरएस घोल - मुँह से पिलाएँ
  • रिंगर लैक्टेट - गंभीर डीहाइड्रेशन में

३. आंत्र शामक (दस्त रोकने के लिए):

  • मेट्रोनिडाजोल - 10 मिग्रा प्रति किलो शरीर भार, दिन में एक बार
  • सल्फाडिमिडीन - 100 मिग्रा प्रति किलो, पहले दिन, फिर 50 मिग्रा प्रति किलो
  • लेवामिसोल 1.5% - कीड़ों के लिए

४. विटामिन और सहायक दवाएँ:

  • विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स - ऊर्जा और रिकवरी के लिए आवश्यक
  • विटामिन ए और डी - इंजेक्शन रूप में
  • मल्टीमिनरल सप्लीमेंट - कमजोरी दूर करने के लिए
  • बुखार की दवा - पैरासिटामोल या मेलोक्सिकैम

५. मुँह के घावों का उपचार:

  • नींबू और संतरे के रस से घाव धोना प्रभावी पाया गया है
  • पोटाश या बोरिक एसिड का घोल (1% घोल में)
  • ग्लिसरीन + टिंचर आयोडीन
  • एंटीसेप्टिक स्प्रे (बीटाडीन)

देखभाल और प्रबंधन:

  • गर्म और ड्राफ्ट-मुक्त जगह में रखें, अच्छी फीडिंग और नर्सिंग जरूरी है
  • बीमार जानवर को तुरंत अलग कर दें
  • नरम, पौष्टिक चारा दें
  • ताजा, साफ पानी हमेशा उपलब्ध रखें
  • शेड की नियमित सफाई और कीटाणुनाशक का छिड़काव करें

बचाव (सबसे महत्वपूर्ण):

  • पी.पी.आर का टीका सबसे प्रभावी बचाव है
  • टीकाकरण कार्यक्रम: हर साल एक बार पी.पी.आर वैक्सीन लगवाएँ
  • 3-4 महीने की उम्र में पहला टीका
  • नए जानवर को 15-20 दिन अलग रखें
  • बीमारी के प्रकोप वाले क्षेत्र से जानवर न खरीदें
  • मेलों और बाजारों से लाए जानवरों की विशेष निगरानी
  • पशु चिकित्सा अधिकारियों को तुरंत सूचित करें यदि पी.पी.आर के लक्षण दिखें

याद रखें: पी.पी.आर से बचाव ही सबसे अच्छा उपाय है। नियमित टीकाकरण जरूर कराएँ। 2030 तक इस बीमारी को पूरी तरह खत्म करने का वैश्विक लक्ष्य है ।

खुरपका-मुँहपका रोग (एफएमडी)

बीमारी के बारे में:

यह एक गंभीर, अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है जो मुख्य रूप से गाय और सूअर को प्रभावित करता है, लेकिन भेड़-बकरी में भी होता है । वयस्क भेड़-बकरी में यह अक्सर हल्का या बिना लक्षण के होता है, लेकिन बच्चों में गंभीर हो सकता है ।

लक्षण:

  • बुखार (2-6 दिन तक रहता है)
  • मुँह, जीभ और होंठों पर छाले
  • खुरों के बीच, एड़ी और थनों पर छाले
  • लंगड़ापन (पहला लक्षण)
  • अधिक लार टपकना
  • खाना-पीना बंद हो जाना
  • दूध उत्पादन में अचानक गिरावट
  • युवा जानवरों में मृत्यु दर 20% या अधिक हो सकती है

रोग का फैलाव:

बीमार जानवरों के स्राव, दूध, वीर्य और चारे के माध्यम से फैलता है। वायरस हवा के जरिए भी फैल सकता है । संक्रमित उपकरण, वाहन, कपड़े और चारे से भी फैलता है । भेड़-बकरी 3-8 दिन में बीमारी दिखाती हैं ।

निदान:

लंगड़ापन और छालों को ध्यान से देखने पर पता चलता है । आरटी-पीसीआर टेस्ट और एंटीजन एलिसा से पुष्टि होती है । भारत में यह रोग सूचित करना अनिवार्य है।

उपचार और बचाव

महत्वपूर्ण: एफएमडी का कोई सीधा इलाज नहीं है। केवल सहायक उपचार और दर्द निवारक दी जाती हैं।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटीबायोटिक (द्वितीयक संक्रमण रोकने के लिए):

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (टेरामाइसिन एलए-200) - 10-20 मिग्रा प्रति किलो, मांसपेशी या नस में, दिन में एक बार 5 दिन
  • पेनिसिलिन-स्ट्रेप्टोमाइसिन - संक्रमण रोकने के लिए
  • सेफ्टियोफर (नैक्सेल) - 2.2 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार 3-5 दिन

२. दर्द निवारक और सूजन कम करने वाली:

  • मेलोक्सिकैम - 0.5 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार
  • फ्लूनिक्सिन (बैनामाइन) - 2.2 मिग्रा प्रति किलो

३. मुँह और खुर के घावों का उपचार:

  • पोटाश या बोरिक एसिड का घोल (1-2% घोल) से मुँह धोएँ
  • ग्लिसरीन + टिंचर आयोडीन (1:1) घावों पर लगाएँ
  • खुरों को जिंक सल्फेट के घोल (5-10%) से साफ करें
  • एंटीसेप्टिक स्प्रे (बीटाडीन) लगाएँ
  • कॉपर सल्फेट पाउडर (नील थोथा) खुरों में भरें

४. सहायक देखभाल:

  • ग्लूकोज सैलाइन ड्रिप (कमजोरी में)
  • विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स और सी इंजेक्शन
  • नरम, पौष्टिक चारा (घास को बारीक काटकर)
  • ताजा, साफ पानी हमेशा उपलब्ध रखें

देखभाल और प्रबंधन:

  • बीमार जानवर को तुरंत अलग करें (क्वारंटीन में)
  • कीटाणुनाशक जैसे आयोडीन या फिनाइल से शेड की सफाई करें
  • मुलायम बिस्तर और सूखी जगह दें
  • सभी उपकरणों को कीटाणुरहित करें
  • जानवरों का आवागमन बंद करें

बचाव (सबसे महत्वपूर्ण):

  • टीकाकरण: हर 6 महीने में एफएमडी का टीका लगवाएँ (सभी सात प्रकारों के खिलाफ प्रभावी नहीं होता)
  • नए जानवर को 21 दिन अलग रखें
  • प्रकोप वाले क्षेत्र से जानवर न लाएँ
  • बाहरी लोगों और वाहनों का प्रवेश सीमित करें
  • जूतों और उपकरणों को कीटाणुरहित करें
  • संदिग्ध मामलों की तुरंत रिपोर्ट करें

याद रखें: यह अत्यधिक संक्रामक बीमारी है। संदेह होने पर तुरंत पशु चिकित्सा अधिकारियों को सूचित करें । टीकाकरण ही सबसे अच्छा बचाव है।

पेट के कीड़े (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल परजीवी)

बीमारी के बारे में:

पेट के कीड़े भेड़-बकरी में सबसे बड़ी समस्या हैं, जो मृत्यु और उत्पादन में कमी का प्रमुख कारण हैं । बारबर पोल वर्म या हेमोनकस कॉन्टोर्टस सबसे खतरनाक परजीवी है । दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में कम से कम 48% फार्मों पर कीड़े सभी प्रकार की दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो चुके हैं ।

लक्षण:

  • वजन न बढ़ना या लगातार घटना
  • खुरदरा, बेजान और मुर्झाया हुआ बाल
  • पलकों का रंग सफेद होना (एनीमिया का संकेत - फैमाचा स्कोर 3 से ज्यादा)
  • दस्त या कब्ज
  • पेट फूला हुआ और "बॉटल जॉ" (जबड़े के नीचे सूजन)
  • कमजोरी, सुस्ती और भूख न लगना
  • युवा जानवरों में विकास रुकना
  • गंभीर मामलों में अचानक मौत

कीड़ों के प्रकार:

  • बारबर पोल वर्म (हेमोनकस) - रक्तचूषक, सबसे खतरनाक
  • ब्राउन स्टोमक वर्म - पेट में रहता है
  • आंत के कीड़े - दस्त का कारण
  • फेफड़ों के कीड़े - खाँसी और साँस की तकलीफ
  • टेपवर्म (फीताकृमि) - कम नुकसान देता है

निदान:

मल परीक्षण (एफईसी - फीकल एग काउंट) करवाएँ। प्रभावी इलाज के लिए 95% या अधिक अंडे कम होने चाहिए । फैमाचा स्कोरिंग सिस्टम से पलकों का रंग देखें (1-5 स्कोर)।

उपचार और बचाव

महत्वपूर्ण: अपने फार्म पर कौन सी दवा प्रभावी है, यह जानना जरूरी है। कई जगहों पर कीड़े दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो चुके हैं ।

कृमिनाशक दवाइयाँ:

१. बेंजिमिडाजोल समूह ("सफेद दवाएँ"):

  • फेनबेंडाजोल (सेफगार्ड, पैनाकर) - 10 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से दें। 12-24 घंटे उपवास रखें, फिर दो खुराक 24 घंटे के अंतर पर । मांस के लिए 16 दिन, दूध के लिए 4 दिन इंतजार करें।
  • एल्बेंडाजोल (वैल्बाजेन) - 20 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से । गर्भवती में मत दें। टेपवर्म और लीवर फ्लूक पर भी काम करता है। मांस के लिए 9 दिन, दूध के लिए 7 दिन इंतजार करें।
  • नोट: यह सबसे पुराना समूह है और इसमें प्रतिरोध सबसे ज्यादा है

२. मैक्रोसाइक्लिक लैक्टोन्स:

  • आइवरमेक्टिन (आइवोमेक ड्रेंच) - 0.4 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से । भेड़ वाला ड्रेंच इस्तेमाल करें, इंजेक्शन वाला नहीं। मांस के लिए 14 दिन, दूध के लिए 9 दिन इंतजार करें।
  • मोक्सीडेक्टिन (साइडेक्टिन ड्रेंच) - 0.4 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से। सिर्फ भेड़ का ओरल ड्रेंच इस्तेमाल करें । मांस के लिए 23 दिन, दूध के लिए 60 दिन इंतजार करें।
  • नोट: मोक्सीडेक्टिन में प्रतिरोध तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि यह आइवरमेक्टिन जैसा ही है

३. इमिडाजोथियाजोल (सबसे प्रभावी):

  • लेवामिसोल (प्रोहिबिट, लेवासोल, ट्रैमिसोल) - 12 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से । मध्य-अटलांटिक क्षेत्र के अधिकांश फार्मों पर यह सबसे प्रभावी है । वजन ध्यान से नापें। मांस के लिए 10 दिन, दूध के लिए 4 दिन इंतजार करें।
  • मोरान्टेल (रुमाटेल) - 10 मिग्रा प्रति किलो । चारे में मिलाकर दें। मांस के लिए 30 दिन, दूध के लिए कोई प्रतीक्षा नहीं।

४. विशेष दवाएँ:

  • क्लोसैन्टेल - बारबर पोल वर्म के लिए विशेष रूप से प्रभावी
  • प्राजिक्वांटेल - टेपवर्म के लिए

महत्वपूर्ण सावधानियाँ:

  • भेड़-बकरी दवाओं को जल्दी मेटाबोलाइज करते हैं, इसलिए खुराक गायों से ज्यादा चाहिए
  • गाय के पोर-ऑन (त्वचा पर लगाने वाले) कभी मत इस्तेमाल करें
  • जानवर का सही वजन नापकर ही दवा दें
  • 12-24 घंटे उपवास रखने से दवा ज्यादा प्रभावी होती है
  • गर्भवती जानवरों में कुछ दवाएँ सुरक्षित नहीं हैं
  • मांस और दूध की प्रतीक्षा अवधि जरूर मानें

बचाव और प्रबंधन:

  • चयनात्मक डीवर्मिंग: सिर्फ उन्हीं जानवरों को दवा दें जिन्हें जरूरत है (फैमाचा स्कोर 3 से ज्यादा)
  • घुमाव चराई: चरागाह को बदल-बदलकर चराएँ (2-3 सप्ताह के बाद)
  • गीली और दलदली जगह से बचें
  • साफ पानी और चारा दें (जमीन से ऊपर)
  • नए जानवर को 14 दिन अलग रखें और डीवर्मिंग करके ही झुंड में मिलाएँ
  • अधिक भीड़ न रखें
  • पौष्टिक आहार दें (प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए)
  • एक ही दवा बार-बार मत दें, प्रतिरोध बढ़ता है

याद रखें: पहले फीकल एग काउंट टेस्ट करवाएँ और देखें कि आपके फार्म पर कौन सी दवा काम कर रही है । अंधाधुंध डीवर्मिंग न करें, इससे प्रतिरोध बढ़ता है। पशु चिकित्सक की सलाह लें।

निमोनिया (फेफड़ों का संक्रमण)

बीमारी के बारे में:

निमोनिया मुख्य रूप से पास्चुरेला मल्टोसिडा और माइकोप्लाज्मा बैक्टीरिया से होता है। ठंड, नमी, भीड़भाड़ और खराब हवादार शेड में यह तेजी से फैलता है। युवा और कमजोर जानवर ज्यादा प्रभावित होते हैं।

लक्षण:

  • तेज बुखार (104-106°F)
  • लगातार खाँसी और छींक
  • साँस तेज-तेज और मुश्किल से लेना
  • नाक से गाढ़ा बलगम (पीला या हरा)
  • आँखों से पानी आना
  • भूख पूरी तरह बंद हो जाना
  • कमजोरी, सुस्ती और अलग-थलग रहना
  • मुँह से साँस लेना
  • गंभीर मामलों में मृत्यु (2-4 दिन में)

कारण:

  • बैक्टीरियल: पास्चुरेला, माइकोप्लाज्मा
  • वायरल: पी.आई-3, आरएसवी
  • ठंड और नमी में अचानक बदलाव
  • खराब हवादार और गंदे शेड
  • अमोनिया गैस से जलन
  • तनाव (परिवहन, दुधारू होना)

निदान:

लक्षणों के आधार पर। स्टेथोस्कोप से फेफड़ों में घरघराहट सुनाई देती है। एक्स-रे से पुष्टि होती है। नाक के स्वैब से बैक्टीरिया कल्चर किया जा सकता है।

उपचार और बचाव

महत्वपूर्ण: निमोनिया में तुरंत इलाज शुरू करना जरूरी है। ओक्सीटेट्रासाइक्लिन और एनरोफ्लॉक्सासिन दोनों प्रभावी हैं। देरी से जान जा सकती है।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटीबायोटिक (प्रथम पंक्ति):

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन एलए (टेरामाइसिन, बायोमाइसिन) - 20 मिग्रा प्रति किलो, मांसपेशी में, दिन में एक बार 5-7 दिन तक
  • एनरोफ्लॉक्सासिन (बेट्रिल) - 5-10 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार 3-5 दिन
  • टुलाथ्रोमाइसिन (ड्रैक्सिन) - 2.5 मिग्रा प्रति किलो, त्वचा के नीचे, एक ही खुराक
  • फ्लोरफेनिकॉल (न्यूफ्लोर) - 20 मिग्रा प्रति किलो, दिन में दो बार 3-5 दिन

२. द्वितीय पंक्ति एंटीबायोटिक (गंभीर मामलों में):

  • सेफ्टियोफर (नैक्सेल, एक्सीड) - 1-2 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार 5 दिन
  • पेनिसिलिन जी (प्रोकेन) - 22,000 यूनिट प्रति किलो, दिन में दो बार
  • टिल्मिकोसिन (माइकोटिल) - केवल त्वचा के नीचे

३. सहायक दवाएँ:

  • बुखार और दर्द निवारक: मेलोक्सिकैम (0.5 मिग्रा प्रति किलो) या फ्लूनिक्सिन (2.2 मिग्रा प्रति किलो)
  • खाँसी की दवा: ब्रोम्हेक्सिन या एम्ब्रोक्सॉल सिरप
  • ब्रोन्कोडायलेटर: एमिनोफिलिन
  • विटामिन इंजेक्शन: विटामिन ए, डी और ई
  • विटामिन सी: 500 मिग्रा, दिन में एक बार

४. द्रव चिकित्सा:

  • ग्लूकोज सैलाइन (5-10%) - 500 मिली-1 लीटर, नस में या त्वचा के नीचे
  • मल्टीविटामिन ड्रिप के साथ

देखभाल और प्रबंधन:

  • गर्म, सूखी और हवादार जगह में रखें
  • ठंडी हवा से बचाएँ
  • बीमार जानवर को अलग रखें
  • भाप देने से राहत मिलती है
  • छाती पर मालिश करें
  • नरम, पौष्टिक और गर्म चारा दें
  • गुनगुना पानी पिलाएँ
  • तनाव से बचाएँ

बचाव (सबसे महत्वपूर्ण):

  • टीकाकरण: पास्चुरेला और माइकोप्लाज्मा के खिलाफ टीका (साल में दो बार)
  • शेड में अच्छी हवा का प्रबंध
  • ठंड और बरसात में विशेष देखभाल
  • भीड़भाड़ न रखें (प्रति जानवर 3-4 वर्ग मीटर जगह)
  • शेड की नियमित सफाई और कीटाणुनाशक का छिड़काव
  • अमोनिया गैस जमा न होने दें
  • नए जानवर को क्वारंटीन में रखें
  • पौष्टिक आहार और साफ पानी
  • तनाव कम करें
  • कमजोर और युवा जानवरों का विशेष ध्यान

याद रखें: निमोनिया में समय पर इलाज बहुत जरूरी है। 24-48 घंटे की देरी जानलेवा हो सकती है। लंबे समय तक काम करने वाले ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन सबसे अच्छी पसंद है। पशु चिकित्सक से तुरंत संपर्क करें।

हमारी सेवाएं

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